भारतीय खाने का इतिहास भाग -२ ( Indian Food History Part -2 )

भारतीय खाने का इतिहास:-

खाद्य का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्‍यता की खान-पान की आदतों का कोई ठोस रिकार्ड नहीं है। 1500 ईसा पूर्व आर्यों के आने के साथ साहित्यिक स्रोत खान-पान के भिन्‍न व्‍यवहार का खुलासा करते हैं। भोजन सरल था क्‍योंकि शुरू के आर्य अर्ध कृषक, अर्ध घुमक्‍कड़ थे। जैसा कि वे 1000 ईसा पूर्व के आसपास गंगा के उर्वर मैदानी इलाकों में बसने लग गए थे, उनका भोजन अधिक जटिल एवं विस्‍तृत हो गया।


ऐसा प्रतीत होता है कि जौ और गेहूँ मुख्‍य रूप से पैदा होते थे और परिणामत: भोजन की प्रमुख वस्‍तु थे। इन अनाजों से विभिन्‍न प्रकार के केक बनाए जाते थे और भोजन के रूप में उनका प्रयोग होता था और देवताओं को अर्पित किया जाता था। पशुओं की बलि चढ़ाने और मांस पकाने, रोस्‍ट करने और उबालने के बार-बार संकेतों का अभिप्राय यह था कि शुरू के आर्य लोग गैर शाकाहारी थे।

जैसे - जैसे कृषि अर्थव्‍यवस्‍था का विकास हुआ, मवेशी एवं अन्‍य पालतू जानवर खेती एवं संबंधित खाद्य उत्‍पादन की गतिविधियों के लिए अधिक उपयोगी बनते गए; मांस के लिए पशुओं को काटना उत्‍तरोत्‍तर महंगा होता गया। यह भारत में शाकाहार की शुरूआत थी। ईसा पूर्व छठवीं शताब्‍दी में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के उत्‍थान से अहिंसा के सिद्धांतों को धार्मिक आधार प्राप्‍त हुआ और आर्यों की संस्‍कृति में मांस खाना अभिशाप बन गया ।



मध्‍य युग के शुरूआत तक शाकाहार आर्य लोगों की खान-पान की मुख्‍य आदत था; वे अनाज, फल और सब्जियां तथा दुग्‍ध उत्‍पाद का सेवन करते थे। गर्म जलवायु तथा बड़ी संख्‍या में जड़ी-बूटियों एवं मसालों की खेती से Preparation अधिक जटिल हो गया। दो हजार वर्ष तक यह परंपरागत रूप से शाकाहारी भारतीय परिवारों - विशेष रूप से उत्‍तर भारत में एक बड़े वर्ग की खान-पान की मुख्‍य आदत के रूप में बना रहा।

इस अवधि के दौरान, भारतीय पाक शैली ने विदेशियों के साथ अंत:क्रिया से भरपूर हासिल किया जो प्रवासी, व्‍यापारी और आक्रमणकारी के रूप में इस उपमहाद्वीप में आए थे - जिसकी वजह से यह विभिन्‍न पाक शैलियों का एक अनूठा मिश्रण बन गई।



विदेश फ्लेवर का पहला भारतीय स्‍वाद ग्रीक, रोमन एवं अरब आक्रमणकारियों के साथ आया जो अनेक महत्‍वपूर्ण जड़ी-बूटियों एवं मसालों तथा सबसे महत्‍वपूर्ण रूप से केसर का प्रयोग करते थे।

विश्‍व की भिन्‍न - भिन्‍न रसोई से एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण प्रभाव अरब आक्रमणकारियों से था जिन्‍होंने कॉफी की शुरूआत की। केरल की पाक शैली पर भी अमिट छाप छोड़ने वाले अरब के लोगों को अब केरला मुस्लिम (या मोप्‍लाह) पाक शैली के नाम से जाना जाता है। मुसलमानों के हाथों से अभियोजन से बचकर निकलने वाले सीरिया के अरब ईसाइयों ने केरल के महाराजा के यहां शरण ली तथा केरल की पाक शैली पर भी काफी प्रभाव छोड़ा।

इसके बाद पारसी यहां आए और भारत को वह दिया जिसे पारसी पाक शैली के नाम से जाना जाता है। कुछ लोगों का विश्‍वास है कि मुगलों द्वारा इसे लोकप्रिय बनाने से पूर्व पारसी लोग सबसे पहले भारत में बिरयानी लाए थे।

मुगलों ने अपने भव्‍य खान-पान तथा ड्राइ फ्रूट्स एवं गिरी से युक्‍त अपने समृद्ध भोजन के माध्‍यम से भारतीय भोजन में क्रांति ला दी, जो एक ऐसी शैली है जो अंतत: मुगलाई पाक शैली के रूप में प्रसिद्ध हुई।

टमाटर, मिर्च और आलू जो आज की भारतीय पाक शैली के मुख्‍य खाद्य पदार्थ हैं, पुर्तगालियों द्वारा भारत लाए गए। पुर्तगालियों ने परिष्‍कृत चीनी भी प्रस्‍तुत की, जिसके पूर्व स्‍वीटनर के रूप में केवल फलों एवं शहद का प्रयोग होता था।



अफगानिस्‍तान से हिंदू शरणार्थी अपने साथ एक ओवन लाए जिसने व्‍यंजनों की पूरी तरह से एक नई श्रृंखला का मार्ग प्रशस्‍त किया - तंदूरी।

ब्रिटिश ने भारतीयों में चाय का स्‍वाद विकसित किया। चाय उगाने के लिए आदर्श जलवायु के साथ भारत तेजी से विश्‍व में चाय प्रेमियों की श्रेणी में शामिल हो गया। ब्रिटिश ने न केवल उसे प्रभावित किया जिसे भारतीय खाते थे, उन्‍होंने भारतीयों के खाने के ढंग को भी बदला। पहली बार भारतीयों ने चाकू एवं कांटे का प्रयोग किया। रसोई में बैठकर खाने का स्‍थान डायनिंग टेबल ने ले लिया।


आभार: खाद्य का इतिहास , भारतीय खाद्य इतिहास

Comments

Jishnu said…
Very Informative..👍