Salt ( नमक) के बिना हम जीवन की कल्पना भी नही कर सकते है लेकिन भोजन के इस प्रमुख अंग के इतिहास के बारे शायद बहुत कम लोग जानते होंगे।
नमक का उपयोग कब से प्रारम्भ हुआ , यह बताना कठिन है। ऋग्वेद में कही इसका उल्लेख नही है अत: यह माना जाता है कि वैदिक युग में नमक का उपयोग नही होता था।
सृष्टि के प्रारम्भिक काल में दो प्रकार का भोजन प्रचलित था | जंगली लोग कच्चा या भुना हुआ मांस खाते थे और सभ्य ,सुसंस्कृत लोग मांस के अलावा फलो तथा दूध का सेवन करते थे। बाद में जब मांस ,अन्न और शाक-सब्जियों के भांति भांति के व्यंजन बनने लगे ,तब नमक की आवश्यकता का अनुभव किया गया और तभी इसकी खोज भी हुयी होगी। अर्थववेद ,शतपत ब्राह्मण ,छान्दोग्य उपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथो में “लवण” का उल्लेख मिलता है ,अत: यह मानना चाहिये कि वैदिक काल के उतरार्ध में इसका उपयोग होने लगा था। प्राचीनकाल में नमक दुर्लभ था ,काफी मेहनत और खर्च करने पर ही थोडा बहुत मिलता था। इसलिए वह एक बहुमूल्य पदार्ध माना जाता था | सभी देशो में उसकी बहुत प्रतिष्ठा थी।
यूरोप के आदि कवि होमर ने नमक को स्वर्गीय पदार्थ कहकर उसका गुणगान किया है। महान दार्शनिक प्लेटो ने उसे “देवताओं का प्रिय पदार्थ” कहा है। अरब वाले भी उसको एक दैवी वस्तु मानते थे और खुदा की कसम की तरह नमक की कसम या नमक हाथ में लेकर कसम खाते थे। मेक्सिको में लोग यह मानते थे कि नमक देवी देवताओ के राजा की बहन है। मंगोलिया ने नमक से बुध भगवान की मूर्ति बनाकर घर घर में उसकी पूजा होती है। इसका एक अलग त्यौहार ही था जो प्रतिवर्ष बड़े उत्साह से मनाया जाता था।
प्राचीन मिस्त्र के लोग नमक को दैवी कवच मानते थे और भुत-प्रेत तथा अनिष्ट निवारण के लिए उसका उपयोग करते थे। रोम में सेलस नामक देवी की पूजा होती थी। रोमन पुराण में यह स्वास्थ्य की रक्षिका और भव-वैभव-दायिनी मानी गयी है। ईसा पूर्व 302 में उसका एक मन्दिर बनाया गया था ,जहा लोग वर्ष के आरम्भ में बीमारी के समय और सम्राट के जन्मदिन पर पूजा करते थे | नमक का “साल्ट” नाम इसी देवी के नाम पर है।
भारत में भी पौराणिक युग में नमक की पूजा का विधान था | वराह पुराण में“लवण-धेनु” की पूजा का महात्म्य वर्णित है। उसके अनुसार नमक की गाय बनाकर सोना ,चांदी ,मक्खन के साथ दान करने से मनुष्य को इस लोक में सब प्रकार के सुख-वैभव मिलते है और मरने पर रूद्र लोक प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण में भी "लवनाचल” की पूजा का विधान बताया गया है।
पहले नमक की प्राप्ति का एक ही साधन था ,समुद्र का खारा पानी। अब बहुत से देशो में अधिकांश नमक समुद्र के पानी से ही बनता है लेकिन समुद्री पानी के अलावा वह खारी झीलों और खारे पानी के कुँओं से और खानों से भी उपलब्ध होता है।इन सबके स्वाद ,गुण और रंग में भी थोडा बहुत अंतर होता है। जर्मनी में नीले ,भारत में गुलाबी ,फारस में भूरे और लाल तथा अफ्रीका में पीले और बैंगनी रंग के खनिज लवण मिलते है।
हमारे देश में नमक का उत्पादन प्राचीनकाल से ही होता रहा है | ईस्वी सन के आरम्भ होने के लगभग 300 वर्ष के पहले से ही सिंध और पश्चिमी पंजाब की पहाडियों से काफी नमक निकाला जाता था। वहा का नमक “सैन्धव लवण” (सेंधा नमक) नाम से विख्यात है , खाने के लिए सर्वोत्तम और सबसे गुणकारी माना जाता है | समुद्री नमक का केंद्र दक्षिण भारत था। वहा के लोग समुद्र के पानी को उबालकर नमक निकालते थे | उसी प्रकार खारे पानी की कई झीलों से , जिनमे राजस्थान की संसार झील मुख्य है तथा खारे पानी के कुओ से भी अनेक स्थानों पर नमक तैयार किया जाता था। उत्तर प्रदेश में लोनिया जाति के लोग लोना मिटटी से नमक बनाते थे। यह उनका जातीय व्यवसाय था।
अंग्रेजी राज्य से पहले यह देश नमक के मामले में आत्म निर्भर था | 1782 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल में नमक बनाने का ठेका लिया | धीरे धीरे ज्यो ज्यो कम्पनी के प्रभुत्व का विस्तार हुआ ,त्यों त्यों वह इस व्यवसाय को अपनी मुट्ठी में करती गयी | तब अन्य किसी को नमक बनाने का अधिकार नही रह गया | सन 1834 में सरकार ने लोना मिटटी से नमक बनाने पर भी रोक लगा दी थी | भारत में अस्सी प्रतिशत नमक इंग्लैंड से आने लगा।
स्वराज होने के बाद इस उद्योग के पुनरुद्धार का प्रयास किया गया है क्योंकि नमक खाने के लिए ही नही ,देश के औधोगिक विकास के लिए भी आवश्यक है। मद्रास ,आंध्र प्रदेश , केरल ,गुजरात और महाराष्ट्र में समुद्र के पानी से काफी नमक तैयार होता है। उसकी प्रक्रिया संक्षेप में यह है -छिछली क्यारिया बनाकर उनमे समुद्र के पानी को रोका जाता है | कुछ समय बाद धुप से सारा पानी उड़ जाता है और नमक के कण नीचे रह जाते है। तब उन्ही क्यारियों में फिर समुद्री पानी जमा किया जाता है | उस पानी के दुबारा सुखने पर कण कुछ बड़े हो जाते है | कई बार ऐसा ही करने से नमक के बड़े बड़े डले तैयार हो जाते है | इसके बाद उन्हें बटोरकर कारखानों में साफ़ किया जाता है।
इसी प्रकार सुप्रसिद्ध साम्भर झील से तथा मद्रास ,गुजरात ,राजस्थान आदि के नमकीन पानी के कुओ से भी काफी मात्रा में नमक तैयार होता है | खनिज (सेंधा जाति का ) इस समय भारत के केवल हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थान में ही मिलता है। 70 प्रतिशत नमक समुद्र के पानी से , 25 प्रतिशत कुँओं के खारे पानी से, 5 प्रतिशत साम्भर आदि झीलों से और 0.06 प्रतिशत खानों से उपलब्ध होता है।
सृष्टि के प्रारम्भिक काल में दो प्रकार का भोजन प्रचलित था | जंगली लोग कच्चा या भुना हुआ मांस खाते थे और सभ्य ,सुसंस्कृत लोग मांस के अलावा फलो तथा दूध का सेवन करते थे। बाद में जब मांस ,अन्न और शाक-सब्जियों के भांति भांति के व्यंजन बनने लगे ,तब नमक की आवश्यकता का अनुभव किया गया और तभी इसकी खोज भी हुयी होगी। अर्थववेद ,शतपत ब्राह्मण ,छान्दोग्य उपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथो में “लवण” का उल्लेख मिलता है ,अत: यह मानना चाहिये कि वैदिक काल के उतरार्ध में इसका उपयोग होने लगा था। प्राचीनकाल में नमक दुर्लभ था ,काफी मेहनत और खर्च करने पर ही थोडा बहुत मिलता था। इसलिए वह एक बहुमूल्य पदार्ध माना जाता था | सभी देशो में उसकी बहुत प्रतिष्ठा थी।
यूरोप के आदि कवि होमर ने नमक को स्वर्गीय पदार्थ कहकर उसका गुणगान किया है। महान दार्शनिक प्लेटो ने उसे “देवताओं का प्रिय पदार्थ” कहा है। अरब वाले भी उसको एक दैवी वस्तु मानते थे और खुदा की कसम की तरह नमक की कसम या नमक हाथ में लेकर कसम खाते थे। मेक्सिको में लोग यह मानते थे कि नमक देवी देवताओ के राजा की बहन है। मंगोलिया ने नमक से बुध भगवान की मूर्ति बनाकर घर घर में उसकी पूजा होती है। इसका एक अलग त्यौहार ही था जो प्रतिवर्ष बड़े उत्साह से मनाया जाता था।
प्राचीन मिस्त्र के लोग नमक को दैवी कवच मानते थे और भुत-प्रेत तथा अनिष्ट निवारण के लिए उसका उपयोग करते थे। रोम में सेलस नामक देवी की पूजा होती थी। रोमन पुराण में यह स्वास्थ्य की रक्षिका और भव-वैभव-दायिनी मानी गयी है। ईसा पूर्व 302 में उसका एक मन्दिर बनाया गया था ,जहा लोग वर्ष के आरम्भ में बीमारी के समय और सम्राट के जन्मदिन पर पूजा करते थे | नमक का “साल्ट” नाम इसी देवी के नाम पर है।
भारत में भी पौराणिक युग में नमक की पूजा का विधान था | वराह पुराण में“लवण-धेनु” की पूजा का महात्म्य वर्णित है। उसके अनुसार नमक की गाय बनाकर सोना ,चांदी ,मक्खन के साथ दान करने से मनुष्य को इस लोक में सब प्रकार के सुख-वैभव मिलते है और मरने पर रूद्र लोक प्राप्त होता है। मत्स्य पुराण में भी "लवनाचल” की पूजा का विधान बताया गया है।
पहले नमक की प्राप्ति का एक ही साधन था ,समुद्र का खारा पानी। अब बहुत से देशो में अधिकांश नमक समुद्र के पानी से ही बनता है लेकिन समुद्री पानी के अलावा वह खारी झीलों और खारे पानी के कुँओं से और खानों से भी उपलब्ध होता है।इन सबके स्वाद ,गुण और रंग में भी थोडा बहुत अंतर होता है। जर्मनी में नीले ,भारत में गुलाबी ,फारस में भूरे और लाल तथा अफ्रीका में पीले और बैंगनी रंग के खनिज लवण मिलते है।
हमारे देश में नमक का उत्पादन प्राचीनकाल से ही होता रहा है | ईस्वी सन के आरम्भ होने के लगभग 300 वर्ष के पहले से ही सिंध और पश्चिमी पंजाब की पहाडियों से काफी नमक निकाला जाता था। वहा का नमक “सैन्धव लवण” (सेंधा नमक) नाम से विख्यात है , खाने के लिए सर्वोत्तम और सबसे गुणकारी माना जाता है | समुद्री नमक का केंद्र दक्षिण भारत था। वहा के लोग समुद्र के पानी को उबालकर नमक निकालते थे | उसी प्रकार खारे पानी की कई झीलों से , जिनमे राजस्थान की संसार झील मुख्य है तथा खारे पानी के कुओ से भी अनेक स्थानों पर नमक तैयार किया जाता था। उत्तर प्रदेश में लोनिया जाति के लोग लोना मिटटी से नमक बनाते थे। यह उनका जातीय व्यवसाय था।
अंग्रेजी राज्य से पहले यह देश नमक के मामले में आत्म निर्भर था | 1782 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल में नमक बनाने का ठेका लिया | धीरे धीरे ज्यो ज्यो कम्पनी के प्रभुत्व का विस्तार हुआ ,त्यों त्यों वह इस व्यवसाय को अपनी मुट्ठी में करती गयी | तब अन्य किसी को नमक बनाने का अधिकार नही रह गया | सन 1834 में सरकार ने लोना मिटटी से नमक बनाने पर भी रोक लगा दी थी | भारत में अस्सी प्रतिशत नमक इंग्लैंड से आने लगा।
स्वराज होने के बाद इस उद्योग के पुनरुद्धार का प्रयास किया गया है क्योंकि नमक खाने के लिए ही नही ,देश के औधोगिक विकास के लिए भी आवश्यक है। मद्रास ,आंध्र प्रदेश , केरल ,गुजरात और महाराष्ट्र में समुद्र के पानी से काफी नमक तैयार होता है। उसकी प्रक्रिया संक्षेप में यह है -छिछली क्यारिया बनाकर उनमे समुद्र के पानी को रोका जाता है | कुछ समय बाद धुप से सारा पानी उड़ जाता है और नमक के कण नीचे रह जाते है। तब उन्ही क्यारियों में फिर समुद्री पानी जमा किया जाता है | उस पानी के दुबारा सुखने पर कण कुछ बड़े हो जाते है | कई बार ऐसा ही करने से नमक के बड़े बड़े डले तैयार हो जाते है | इसके बाद उन्हें बटोरकर कारखानों में साफ़ किया जाता है।
इसी प्रकार सुप्रसिद्ध साम्भर झील से तथा मद्रास ,गुजरात ,राजस्थान आदि के नमकीन पानी के कुओ से भी काफी मात्रा में नमक तैयार होता है | खनिज (सेंधा जाति का ) इस समय भारत के केवल हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थान में ही मिलता है। 70 प्रतिशत नमक समुद्र के पानी से , 25 प्रतिशत कुँओं के खारे पानी से, 5 प्रतिशत साम्भर आदि झीलों से और 0.06 प्रतिशत खानों से उपलब्ध होता है।







Comments